अनमोल वचन

1- अवस्तुता एक शुन्यता है। इसे भरने का मनुष्य जीवन भर प्रयत्न करता है और वस्तु अवस्तु को भरती जाती है यही विसंगति का मुल कारण है।

 

2- हम लोग जितनी ऊँचाई पर चढ़ते जाते हैं वस्तु उतना ही कम करते जाते या कम रखना चाहेगें वस्तुता ही भार है अवस्तुता निर्भार की स्थिति है। अस्तित्व के उत्कर्ष पर पहुँच के पूर्व हम सर्वथा निर्भार हो जाना चाहेगें।

 

3- भाव एवं तर्क के बीच अलंघ्य खाई है जो एक दूसरे को अलग-अलग करने को हमें वाध्य करती है।

 

4- अनन्त इच्छाओं का अन्त ढ़ूढ़ँना ही जीवन है इच्छाओं का अन्त ही मृत्यु है जब तक इच्छायें अनन्त है, तभी तक जीवन है जहाँ इच्छाओं का अन्त हुआ समझो जीवन समाप्त हो गया।

 

5- ज्ञान का आदि जिज्ञासा है  ज्ञान का अंत संतुष्टि है। जिस व्यक्ति मे जिज्ञासा नही उसे ज्ञान कहाँ ज्ञान का आखरी पड़ाव वैयक्तिक तुष्टि में है।

 

6- मनुष्य इस प्राकृतिक के सूरभ्य दृश्यों की ओर आकर्षित होता है। यह इसलिये नहीं वल्कि हमारी प्रकृति में इस प्रकृति का सूक्ष्म रूप मे हमारे अन्दर विद्यमान होता है।